इस बार सोलह श्राद्ध 15 दिन, पितरों को धूप पूर्णिमा से अमावस्या तक 16 दिन लगेगी
इस बार सोलह श्राद्ध 15 दिन, पितरों को धूप पूर्णिमा से अमावस्या तक 16 दिन लगेगी
श्राद्ध पक्ष: 26 को महालय श्राद्ध का आरंभ, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या
ग्रह गोचर की गणना एवं परिभ्रमण की स्थितियों के अनुसार इस बार महालय श्राद्ध की शुरुआत विशिष्ट परिस्थितियों में हो रही है एवं ग्रहों का विशेष योग बन रहा है। यही नहीं 60 वर्ष के बाद यानी 6 दशक के बाद इस प्रकार के ग्रहों की पुनरावृत्ति का होना भी अलग-अलग प्रकार के घटनाक्रमों को दर्शा रहा है। धार्मिक व आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह शुभकारी है।
महालय श्राद्ध का आरंभ भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 26 सितंबर से शुरू होगा। जो आश्विन के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 10 अक्टूबर पर्यंत माने जाएंगे। ग्रह गोचर की गणना के आधार पर इस बार महालय श्राद्ध 1966 के बाद 2026 में विशेष ग्रह योग के अंतर्गत आ रहे हैं, जिसमें बुधादित्य योग के साथ केंद्र के साथ त्रिएकादश के योग भी बन रहे हैं। इसमें क्रमानुसार सूर्य बुध, कन्या, राशि में, चंद्र शनि, मीन राशि में, मंगल बृहस्पति, कर्क राशि में होने से यह विशिष्ट स्थिति को दर्शा रहा है। धार्मिक मतानुसार सूर्य का कन्या राशि का गोचर पितरों के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। उसमें भी यदि बुधादित्य का योग बनता हो और केंद्र एकादश का योग बनता हो तो वह विशेष शुभ माना जाता है। ऐसे योग में पितरों के निमित्त किए जाने वाले तर्पण श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, एकोदिष्ट श्राद्ध, तीर्थ श्राद्ध, नारायण बलि कर्म आदि पितृ कर्म विधि विधान से करने पर घर परिवार में सुख, शांति के साथ-साथ रुके कार्य में प्रगति होती है। साथ ही स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं का निराकरण होता है। इस दृष्टि से महालय श्राद्ध में अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध पूजन अवश्य करना चाहिए। शनिवार से आरंभ, इसी दिन पूर्ण होंगे
इस बार महालय श्राद्ध का आरंभ शनिवार से होकर शनिवार पर पूर्ण होगा। शनि ग्रह को पितरों का समकारक ग्रह माना गया है और पूर्णिमा तिथि पर शनिवार का होना एवं अमावस्या तिथि पर भी शनिवार का होना यह भी एक संयोग है। तिथि के क्षय होने के बाद भी श्राद्ध की संख्या 16 ही रहेगी, क्योंकि एक दिन में दो तिथियों का श्राद्ध समय अंतर से किया जा सकता है। हालांकि इसके अंतर्गत पारिवारिक, गोत्र परंपरा और शाखा परंपरा का भेद आता है। फिर भी धर्म शास्त्रीय व पौराणिक मत के अनुसार कुतप काल एवं अपराह्न काल का उल्लेख किया है। इस दृष्टि से कुछ पंचांग में पंचमी तो कुछ में अष्टमी तिथि का क्षय बताया है। हालांकि पंचमी व अष्टमी के श्राद्ध का स्पष्टीकरण भी दिया है।
किस दिन कौनसी तिथि का श्राद्ध करें
26 सितंबर पूर्णिमा का श्राद्ध,
27 को प्रतिपदा का श्राद्ध,
28 को द्वितीय का श्राद्ध,
29 को तृतीया का श्राद्ध एवं भरणी श्राद्ध,
30 सितंबर चतुर्थी का श्राद्ध मध्याह्न उपरांत पंचमी,
1 अक्टूबर पंचमी का श्राद्ध (दोपहर 12.30 तक), दोपहर 12:30 पर छठा का श्राद्ध आरंभ,
2 को सप्तमी का श्राद्ध,
3 को अष्टमी,
4 को नवमी,
5 को दशमी,
6 को एकादशी,
7 को द्वादशी,
8 को त्रयोदशी,
9 अक्टूबर को चतुर्दशी का श्राद्ध और
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध किया जा सकेगा।
श्राद्ध कर्म में कुश का महत्व, इसका उपयोग अनिवार्य
श्राद्ध-तर्पण के दौरान कुश अत्यधिक महत्वपूर्ण है। विधि-विधान से किए जाने वाले तर्पण में कुश का उपयोग अनिवार्य है। तर्पण के समय आसन कुश का होना चाहिए। तर्पण के समय दोनों अनामिका अंगुलियों में पहनने वाली पवित्रा भी कुश की बनी होती है। जल देते समय कुश को स्थिति विशेष में रखते हैं और जल ऐसे गिराया जाता कि वह कुश का छूता हुआ ही जाए। अग्नि पुराण में वर्णन है श्राद्ध के दौरान अंगूठे के माध्यम से पितरों को जल अर्पित करने से आत्मा को तृप्ति मिलती है।
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