लोकसरिता क्षिप्रा
लोकसरिता क्षिप्रा
हमारी परंपरा इन नदियों की अर्चना करती है। वैदिक ऋषियों ने नदियों की वंदना में ऋचाएं लिखी हैं। हमारा इतिहास नदियों के प्रवाह से रचा गया इतिहास है और उनके तट हमारी परंपरा के विकास की कहानी कहते हैं। शिप्रा भी मानव के जीवन का पर्याय है। वह किसी पर्वत से नहीं धरा के गर्भ से फूटकर घरातल पर बहती है। इसलिए वह लोकसरिता है। इसके प्रभाव में लोकजीवन के सुख-दुख के स्वर घुले मिले हैं। अपने आराध्य महाकाल का युगों से अभिषेक करते यह हमारी आस्था की केन्द्र बन गई है। हर बारह साल बाद इसके तटों पर आस्था का महामेला सिंहस्थ के रूप में सजता है

पश्चिम के किसी कवि ने कहा कि ‘आप किसी एक नदी में दो बार नहीं उतर सकते’ कहने का आशय यह है कि नदी का पानी बहता रहता है और हर बार हमारे सामने एक नई नदी होती है। कवि की इस उक्ति के पीछे पवित्रता का वही भाव है जो भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। हालांकि पश्चिम में नदियों को उतना ही महत्व दिया जाता है जितनी उसकी उपयोगिता होती है। हमारे यहाँ गंगा, नर्मदा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियों के साथ हमारी जातीय स्मृति घुली मिली है। पवित्रता का एक ऐसा भाव हमारे पुरखों ने इन नदियों के साथ जोड़ा है कि हमारी सभ्यता-संस्कृति का प्राण बन गई।
चर्मण्वती जिसे आज चंबल कहा जाता है, शिप्राकी सहायक नदी है मार्केण्डेय पुराण में इन दोनों नदियों
का उल्लेख आता है। स्कंध पुराण के अनुसार शिप्रा उत्तरगामी है और उत्तर में बहते हुए ही चंबल में जा
मिलती है। क्षिप्रा का उल्लेख यजुर्वेद में भी है। वहाँ’शिप्रेः अवेः पत्रः’ कहते हुए वैदिक ऋषियों ने क्षिप्रा का
स्मरण किया है। इसका उल्लेख महाभारत, भगवतपुराण, ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण तथा वामनपुराण मे भी है क्षिप्रा की महिमा का संस्कृत साहित्य में खूब उल्लेख है।
महाकवि कालिदास ने क्षिप्रा का काव्यमंच में उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘शिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थना घाटकारः’ और महर्षि वशिष्ट ने क्षिप्रा स्नान को मोक्षदायक मानते हुए क्षिप्रा और महाकाल की वंदना इन शब्दों में की है –
महाकाल श्री शिप्रा गतिश्चैव सुनिर्मला
उज्जयिन्यां विशालाक्षि वासः कस्य न रोचते ।।
स्नानं कृत्वा नरो यस्तु महानचांहि दुर्लभम्
महाकालं नमस्कृत्य नरो मृत्युं न शोचते ।।
जब नदियों का मानवीकरण किया तो हमारी कल्पनाएं भी उन्हीं के साथ साकार रूप लेने लगीं।
इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि कई किवदंतियां व कथाएं क्षिप्रा के प्रभाव के साथ जुड़ गईं।
एक किवदंती के अनुसार उज्जयिनी में अत्रि ऋषि ने तीन हजार साल तक कठोर तपस्या की। इस दौरान
उन्होंने अपने हाथों के ऊपर ही उठाए रखा। अपनी तपस्या पूर्ण होने के बाद जब उन्होंने नेत्र खोले तब देखा
कि उनके शरीर से प्रकाश के दो स्त्रोत प्रवाहित हो रहे हैं- पहला आकाश की ओर गया और चन्द्रमा बन गया और दूसरे ने जमीन पर क्षिप्रा नदी का रूप धारण किया। क्षिप्रा को सोमवती के नाम से भी जाना जाता है।

भागवत के दशम स्कंध में वह जगत प्रसिद्ध कथा है कि जब उज्जैन में महर्षि संदीपनी के आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु दक्षिणा देनी चाही तो गुरू पत्नी ने कहा कि मेरा पुत्र जो क्षिप्रा में डूबकर मृत्य को प्राप्त हो गया है, उसे लौटा दो जिससे मेरा वंश चले भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी आज्ञा का पालन किया।
अनेक कथाओं की जननी ऐसी क्षिप्रा ने उज्जयिनी को तीन तरफ से घेर रखा है वह दक्षिण-पूर्वी छोर से
नगर में प्रवेश करती है। फिर वह हर स्थान व मोड़ पर मनोहारी दृश्य स्थापित कर लेती है त्रिवेणी का तट हो या चिंतामणि गणेश की ओर जाने का मार्ग, वहाँ क्षिप्रा की सुंदर भंगिमा के दर्शन होते हैं।
महाकाल तथा हरसिद्धि के आशीर्वाद से वह अभिशिक्त होती है और भगवान महाकाल के समक्ष उसकी उत्तल तरंगें मानों नर्तन करती हैं और दुर्गादास की छत्री की ओर बढ़ते हुए वह चक्रतीर्थ काशी के मणिकर्णिका घाट का स्मरण कराती हैं। वह भर्तृहरि गुफा, पीर मछींदर, गढ़कालिका और कालभैरव क्षेत्र को पारकर संदीपनी आश्रम और राम जर्नादन मंदिर को निहारकर मंगलनाथ पहुँचती है तथा जइस मार्ग में वह गंगाघाट से गुजरती है। आगे बढ़कर वह सिद्धवट की ओर मुड़ती है और फिर कालियादह महल को घेरती है यहाँ कई मोड़ लेती क्षिप्रा की भंगिमा दर्शनीय है। फिर आगे वह नगर के मध्य में महाकाल को प्रणाम करती है। क्षिप्रा का यह रूप युगों से तपस्वियों को आकर्षित करता आया है और ये तट इतिहास में अमर हो गए हैं। क्षिप्रा के किनारे अट्ठाईस प्रमुख तीर्थ हैं। इनमें कर्कराज, नृसिंह तीर्थ, पिशाचमुक्ते तीर्थ,गन्धर्व तीर्थ, कैदार तीर्थ सोमतीर्थ, चक्रतीर्थ कान्हाभैरव तीर्थ, मंगल तीर्थ और शक्तिभेद तीर्थ मुख्य हैं। क्षिप्रा उज्जैन को ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व प्रदान करती शाश्वत नदी है।
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